निंदा आकाश की ओर फेंके गए उस पत्थर के समान है जो लौटकर उसी पर गिरता है जिसने उसे फेंका था

निंदा (Condemnation) या आलोचना / Criticism मानव स्वभाव में तबसे पनप रही है जबसे उसने इस संसार में अपना पहला कदम रखा था। संसार में मानव की उत्पत्ति एवं विकास के बाद समाज का निर्माण अमल में आया और मानव धरती के अन्य जीवों से अलग होकर अपनी बुद्धि और विवेक का प्रदर्शन करने लगा।

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